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Chakva Chakvi- the sign of love

प्रेम और विरह का प्रतीक चकवा- चकवी

23 Feb,2021, Bhopal, खूबसूरते सुनहरे रंग का यह जोड़ा चकवा पक्षी का है। सर्दियों शुरु होते ही बड़ी संख्या में ये पक्षी उत्तरी सीमाओं से प्रवास पर भोपाल आते हैं। जिन्हें कलियासोत डेम, बड़ा तालाब, शाहपुरा झील में देखा जा सकता है। मार्च आते आते ये वापस लौट जाते हैं।

इसे ब्राम्हणी डक तथा Ruddy Shelduck भी कहा जाता है। हंस वर्ग का यह पक्षी लगभग 2 फीट का होता है।यह पक्षी हमेशा जोड़ा बनाकर रहता है। इसकी आवाज बहुत कर्कश होती है।किंवदंतियों के अनुसार चकवा-चकवी दिन भर साथ रहते हैं, लेकिन सूर्यास्त के बाद बिछड़ जाते हैं और फिर सूर्योदय पर ही मिलते है। रात में चकवा तेज आवाज में चकवी के लिये पुकारता रहता है। इसी विरह को कई कवियों ने शब्दों में उकेरा है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा की विरह अवस्था में चातक का स्मरण करते हुए कहा है-बलि-जाऊँ बलि-जाऊँ चातकी, बलि-जाऊँ इस रट की।मेरे रोम-रोम में आकर, यह काँटे-सी खटकी॥

जयशंकर प्रसाद ने अपने ‘नीरद’ शीर्षक रचना में चातक के करुण विलाप का वर्णन करते हुए कहा है- चपला की व्याकुलता लेकर चातक का करुण विलाप,तारा-आँसू पोंछ गगन के, रोते हो किस दुख से आप?

तुलसीदास जी ने चातक के मानस की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहा है————————-मुख-मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर।सुजस-धवल, चातक नवल! रह्यो भुवन भरि तोर॥

कबीर ने कहा है———————————————————————————————-साँझ पड़े दिन बीतबै । चकवी दीन्ही रोय । चल चकवा वा देश को । जहाँ रैन नहिं होय ।

अमीर खुसरो के शब्दो में ———————————————————————————चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय।ये मारे करतार के रैन बिछोया होय॥

छाया एवं आलेख – देवेंद्र दुबे

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