LEARN PHOTOGRAPHY

CLASS – 1

दोस्तों आज डिटिटल फोटोग्राफी का युग है। बहुत सारे काम Camera स्वयं कर देता है। फोटो भी तुरंत स्क्रीन पर आ जाती है। फोटोग्राफी शुरु करने से पहले Camera की अच्छी जानकारी होनी जाहिए। क्योंकि Camera आपका हथियार है। जिसकी जानकारी के बगैर फोटोग्राफर बनना संभव नहीं है। सिर्फ क्लिक करने मात्र से फोटोग्राफर नहीं बना जा सकता। फोटोग्राफी एक कला है और अन्य कलाओं की तरह ही इसके भी basics जाने बगैर फोटोग्राफर नहीं बना जा सकता।

सबसे पहले हम बात करें फोटोग्राफी शब्द की। Photography का शाब्दिक अर्थ ही इसके मूल को परिभाषित करता है। Photography दो शब्दों से मिलकर बना है Photo & Graph। यहां Photo का अर्थ वही है जो फोटोसिंथेसिस, फोटोक्रोमेटिक इत्यादि शब्दों में होता है अर्थात Light या प्रकाश और Graph का अर्थ है चित्र बनाना। इस प्रकार प्रकाश के माध्यम से चित्र बनाना फोटोग्राफी कहलाता है। जिसे विस्तार से हम अगली क्लास में समझेंगे।
एक पुरानी कहानी फोटोग्राफी के अविष्कार को बतलाती है। किसी देश में एक व्यकित दुनिया धूम कर वापस पहुंचा । उसने अपने लोगों को दुनिया भर में देखे अदभुत नजारों के बारे में बताया। लेकिन वो शब्दों के माध्यम से सबकुछ वैसा नहीं समझा सका जैसा उसके दिमाग में अंकित था। तब उसने सोचा कि जिस तरह आंख के माध्यम से कोई दृश्य मस्तिष्क में स्थायी रुप से अंकित हो जाता है। वैसे ही किसी उपकरण का अविष्कार हो जो किसी बाहरी माध्यम पर एेसा ही चित्र अंकित कर दे। जिसे और लोगों को भी दिखाया जा सके। यहीं से कैमरा अविष्कार की बात शुरु हुई जो आज आपके सामने DSLR Camera के रुप में है।

Camera & eye

Camera & eye

ये DSLR शब्द जो आजकल ज्यादा ही सुनाई देता है। ये क्या है। इसका अर्थ भी जानना जरुरी है। D का मतलब Digital और एसएलआर का मतलब Single lens reflex.  SLR कैमरा बहुत पहले से चलन में है डिजिटल टेक्नालाजी आने के बाद यह DSLR कहलाने लगा।
SLR समझने के लिये इतिहास में जाना पड़ेगा। SLR से पहले TLR कैमरा प्रयोग में आता था। TLR का मतलब है Twin lens reflex । इस कैमरे में दो लेंस होते थे उपर वाले लेंस से प्रकाश व्यूफाईंडर में जाता था और हम इमेज को क्लिक करने से पहले व्यूफाईंडर में देखते थे। क्लिक करने के बाद नीचे वाले लेंस से प्रकाश जाकर फिल्म को एक्सपोज करता था या फोटो खींचता था। दो अलग अलग लेंस होने के कारण त्रुटियों की संभावना रहती थी। इसलिये एसएलआर या सिंगल लेंस रिफलेक्स का अविष्कार हुई। जैसा आप देखते हैं इसमें एक ही लेंस है जो क्लिक करने से पहले व्यूफाईंडर या स्क्रीन पर दिखाता है और बाद में इसी लेंस के माध्यम से प्रकाश कैमरा सेंसर तक पहुंचता है।

Types of camera

Types of camera

आज के लिये इतना ही कल अगली क्लास में फिर मिलेंगे।

Class- 2

आईए आज हम अपने कैमरे से परिचित होते हैं।
कैमरा के मुख्य रुप से दो पार्ट होते हैं। कैमरा बाडी और लेंस।

camera parts

camera parts

कैमरा बाडी हाई ग्रेड प्लास्टिक और मेटल एलाॊय से बनी होती है।
1- कैमरा माउंट ये मेटल का बना वो हिस्सा होता है जहां से लेंस, बाडी से जुड़ता है।
2- मिरर- लेंस अलग करने पर यह मिरर नजर आता है। इसका काम लेंस से आने वाले लाईट को रिफलेक्ट करके पेंटाप्रिज्म तक भेजना है। केमरा क्लिक होने पर यह मिरर उपर उठ जाता है। और लेंस से आने वाला लाईट, इमेज सेंसर तक पहुंचकर उसे एक्सपोज करता है(अर्थात फोटो खिंच जाता है)। फिर यह अपनी पूर्व स्थिति में आ जाता है।
3- पेंटाप्रिज्म- यह पांच साईट वाला आप्टिकल ग्लास का बना प्रिज्म होता है। जो मिरर से आने वाले लाईट को व्यूफाईंडर तक पहुंचाता है ताकि व्यूफाईंडर में आप क्लिक करने से पहले दृश्य को देख सकें।
4- व्यू फाईंडर- ये कैमरे का वो हिस्सा है जहां आप अपनी आंख लगाकर कैमरे में झांकते हैं। यहीं से आप देखते हैं कि क्या क्लिक करना है। दृश्य को फोकस भी आप यहीं से देखकर करते हैं।
व्यू फाईंडर दो तरह के होते हैं। आप्टिकल व्यू फाईंडर और इलेक्ट्रानिक व्यू फाईंडर।
5- स्क्रीन- यह स्कीन कैमरे के पिछले हिस्से में होती है। मुख्य रुप से इसे इमेज के प्रिव्यू और पोस्टव्यू के लिये उपयोग में लाते हैं लेकिन लाईव व्यू मोड में यह व्यूफाईंडर का काम करता है। मूवेबल स्क्रीन की मदद से आप आईलेवल से उपर या नीचे जाकर भी दृश्य को अच्छी तरह देख सकते हैं और फोकस कर सकते हैं।
6- शटर- कैमरा मिरर के ठीक पीछे वाला पर्दा शटर कहलाता है। कैमरे का इमेज सेंसर इसके पीछे होता है। क्लिक करने पर यह शटर उठ जाता है और प्रकाश सीधा इमेज सेंसर तक पहुंचकर उसे एक्सपोज कर देता है। इसके चलने की स्पीड को शटर स्पीड कहते हैं। जिसे हम आगे विस्तार में पड़ेंगे।
7- इमेज सेंसर- कैमरा शटर के ठीक पीछे इमेज सेंसर होता है। निगेटिव या कैमरा फिल्म को इसी ने रिप्लेस किया है। ये लाईट सेसिटिव होते है और जैसे ही क्लिक करने पर पर्दा या शटर उठता है। ये एक्सपोज हो जाता है या फोटो खिंच जाती है। पहले सीसीडी सेंसर यूस किये जाते थे लेकिन अब सीमोस सेंसर यूस होते हैं।
8-मोड डायल- ये कैमरे में प्रिज्म के लेफ्ट साईड में सबसे उपर होता है। इस पर कैमरे के विभिन्न मोड जैसे आटो, प्रोग्राम, शटर प्रायर्टी, अपरचर प्रार्यटी, मेनुअल अंकित होते है। कैमरे को किसी विशेष मोड में इसी डायल को एडजस्ट करके लाया जा सकता है।
9 -बिल्ट इन फ्लैश- कैमरे के उपरी हिस्से में फ्लैश होता है। जो बटन दबाने से खुल जाता है। इसके उपर हाट शू होता है। जहां पर हम बाहरी फ्लैश को फिट कर सकते है।
इसके अलावा बैटरी स्लाट, मेमोरी कार्ड स्लाट, शटर क्लिक बटन इत्यादि भी होते हैं।

camera function

camera function

कैमरा लेंस- कैमरा लेंस आप्टिकल लेंस होते हैं, ये एक या ज्यादा लेंसों के संयोजन से बनते हैं।
इसका मुख्य कार्य दृश्य को इमेज सेंसर पर फोकस करना होता है। लेंस में मुख्य रुप से दो चीज होती हैं। फोकल लेंथ और अपरचर। फोकल लेंथ ही इमेज को बड़ा या छोटा करती है। नार्मल लेंस की फोकल लेंथ लगभग 50 mmहोती है। इससे नीचे जैसे 28, 18 mmइत्यादि वाईड लेंस कहलाते है। इसके उपर जैसे 100, 200 mm टेली लेंस कहलाते हैं। लेंस अपरचर जिसे हिंदी में लेंस छिद्र भी कह सकते हैं लेंस की ओपनिंग होती है। सेंसर तक कितना लाईट पहुंचना है इसी से कंट्रोल होता है। एक डायफ्राम के माध्यम से इसे आपरेट किया जाता है। इसे एफ नंबर के रुप में दर्शाया जाता है। जैसे ि 2.8,4,5.6,8,11,16,इत्यादि। लेंस दो प्रकार के होते हैं फिक्स लेंस और जूम लेंस। एक फिक्स फोकल लेंथ वाला लेंस फिक्स लेंस कहलाता है। जूम लेंस वो होतें हैं जिनकी फोकल लेंथ बदली जा सकती है और इमेज को वाईड या टेली किया जा सकता है। लेंस कई आप्टिकल एलीमेंट के संयोजन से बनते है। इन एलीमेंट की क्वालिटी पर ही हमारे फोटो की क्वालिटी डिपेंड होती है।

camera lens

camera lens

CLASS- 3

आज हम फोटोग्राफी बेसिक्स की बात करेंगे।
फोटोग्राफी के दो भाग होते हैं। एक्सपोजिंग और कम्पोजिंग
आज हम एक्सपोजिंग के बारे में पड़ेंगे

अपरचर, शटर स्पीड और आईएसओ चार्ट

अपरचर, शटर स्पीड और आईएसओ चार्ट

एक्सपोसिंग– इसका अर्थ है कैमरे को सही एक्सपोजर देना। फोटोग्राफी में एक्सपोजर का अर्थ है प्रकाश की वह मात्रा जो लेंस के माध्यम से इमेज सेंसर तक पहुंचती है। अच्छे फोटो के लिये सही एक्सपोजर होना जरुरी है। अंडर एक्सपोज इमेज अर्थात जिसमें प्रकाश कम पहुंचता है और फोटो डार्क हो जाता है। ओवरएक्सपोज इमेज में प्रकाश जरुरत से ज्यादा हो जाता है फोटो ज्यादा प्रकाशित होने से ब्राईटनेस ज्यादा हो जाती है। दोनों ही परिस्थितियों में इमेज की सही ब्राईटनेस और कलर नही मिलते जिसे हम खराब फोटो भी कहते हैं।

कैमरा में एक्सपोजर कंट्रोल मुख्य रुप से दो माध्यम से होता है। एक अपरचर और दूसरा शटर स्पीड।
अपरचर– जब आप अपने लेंस में झाकते हैं तो ओपनिंग या छिद्र दिखाई देता है। लेंस में यहीं से लाईट अंदर सेंसर तक पहुंचता है। इसे छोटा या बड़ा करके प्रकाश की मात्रा को कम या ज्यादा किया जा सकता है। इसे एक डायफ्राम रिंग द्वारा कंट्रोल किया जाता है। अपरचर को f नंबर के रुप में दर्शाते हैं। जैसें f 1.8, 2, 4, 5,6 ———-22 इत्यादि। f नंबर जितना छोटा होता है अपरचर उतना ज्यादा ओपन होता हैं। अपने लेंस की फुल ओपनिंग जानने के लिये आपको लेंस के अगले भाग में देखना होगा। जैसे आपके 50 mm के लेंस पर लिखा होता है 50 mm f 1.8, इसका अर्थ यह है कि आपके लेंस की फुल ओपनिंग पर अपरचर 1.8 है। इसी तरह जूम लेंस पर f 3.5-5.6 लिखा होता है। इसका अर्थ यह है कि कम फोकल लेंथ जैसे 28 या 35 mm पर मेक्सिमम अपरचर 3.5 होता है जबकि 100 या 200 पर 5.6 होता है। कम लाईट में ज्यादा ओपनिंग जैसे 1.8 या 2.8 के लेंस ज्यादा उपयुक्त होते हैं।
शटर स्पीड– जब आपके लेंस से प्रकाश इमेज सेंसर तक जाता है। तो इसके बीच में शटर या पर्दा होता है। जो इस लाईट को एक निश्चित अवधि या समय के लिये सेंसर तक पहुंचाता है। शटर अगर ज्यादा देर तक खुला रहेगा तो प्रकाश ज्यादा मात्रा में जाएगा और सेंसर ज्यादा देर तक एक्सपोज होगा। इसी प्रकार जल्दी शटर बंद होने से कम मात्रा में प्रकाश जाएेगा। एक्सपोजर के इस टाईम को कंट्रोल करने के लिये शटर की स्पीड होती है जिसे शटर स्पीड कहते हैं। फास्ट शटर स्पीड या फास्ट एक्सपोजर और लो शटर स्पीड या लांग एक्सपोजर। आपके कैमरा स्क्रीन में अपरचर के साथ स्पीड भी दिखाई देती है जिसे 250,125, 50,3 ,2,1, 2″ , 5″ ,10″ इत्यादि से दर्शाया जाता है। अगर हम देखें कैमरा 250 या 2 दिखा रहा है इसका मतलब है आपकी शटर स्पीड 1/250 सेकंड या 1/2 सेकंड है। इसी तरह अगर हम 2″ या 10″देखें तो इसका मतलब है की शटर स्पीड 2 सेकंड या 10सेकंड है। 250,500, 1000 इसे फास्ट शटर स्पीड कहते है। फास्ट मूविंग सब्जेक्ट के लिये फास्ट शटर स्पीड का उपयोग करते हैं। इसे हम बाद में विस्तार से पढ़ेंगे। 30,15,2,1, 2″,15″ .. इत्यादि को स्लो शटर स्पीड कहते हैं क्योंकि इसमें शटर ज्यादा देर तक खुला रहता है इसलिये कम प्रकाश में फोटोग्राफी के लिये स्लो शटर स्पीड उपयुक्त होती है। आप जब क्लिक करते हैं तो अगर शटर की आवाज बहुते कम समय तक आती है अर्थात आपका शटर फास्ट चल रहा है। अगर शटर की आवाज लंबी सुनाई दे तो इसका मतलब शटर स्पीट स्लो है।
इस तरह आप समझे कि सही एक्सपोजर के लिये प्रकाश की मात्रा को कंट्रोल करना जरुरी है।
जिसे हम अपरचर और शटर स्पीड के माध्यम से कंट्रोल कर सकते हैं। उदाहरण के रुप में किसी जगह प्रकाश कम हो और अपरचर की फुल ओपनिंग के बाद भी एकस्पोजर कम हो रहा हो तो आप शटर की स्पीड कम करके सेंसर तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।
एक ध्यान रखने की बात ये है कि स्लो शटर स्पीड पर आपके सबजेक्ट और कैमरा दोनों की स्थिरता जरुरी है अन्यथा फोटो ब्लर हो जाता है जिसे आप सामान्य भाषा में हिला हुआ फोटो कहते हैं।
एक ओर तत्व जो एक्सपोजर से जुड़ा है वह है ISO सेंस्टिविटी। कई बार हमें लो लाईट में भी फास्ट शटर स्पीड की जरुरत होती है ताकि फोटो ब्लर ना हो। इसके लिये हम सेंसर का आईएसओ सेट करते हैं। यह सेंसर की लाईट सेंस्टिविटी है। यह जितनी ज्यादा होती है। सेंसर उतने कम लाईट में भी फोटो को एक्सपोज कर लेता है। जैसे 200 आईएसओ पर आपको शटर स्पीड 1/30 मिल रही है तो 400 पर यह लगभग 1/60 हो जाएेगी। जिससे आपके फोटो ब्लर की संभावना कम होगी।
एक सावधानी यह रखें कि कैमरा का आईएसओ कैमरे की ताकत के अनुरुप ही हो। लो बजट एसएलआर में बहुत ज्यादा आईएसओ यूस करने से इमेज ग्रेनी या दानेदार हो जाती है। जिसे फोटो फटना कहते हैं। इससे इमेज की डिटेल खत्म हो जाती हैं।

CLASS-4

आज हम पढ़ेंगे कम्पोजिशन के बारे में।
आज डिजिटल युग में कैमरा बहुते सारे काम खुद कर लेता है। आटो फोकस करता है। एक्सपोजर भी कैमरा ही रीड कर लेता है। इसलिये लोग कहते हैं कि फोटो खींचना आसान हो गया है। लेकिन फोटोग्राफी में आप क्या क्लिक करते हैं ये ही जरुरी नहीं है, बल्कि कैसे क्लिक करते हैं ये भी मायने रखता है। एक अच्छे सबजेक्ट को सही एंगल की जरुरत होती है। खराब एंगल एक अच्छे फोटो को भी बेकार कर देता है। जबकि एक साधारण फोटो को भी अच्छे एंगल से क्लिक करके उसे आकर्षक बनाया जा सकता है। किसी दृश्य को क्लिक करते समय सही सबजेक्ट का निर्धारण करनी भी जरुरी है। एक चीज और जो आपके फोटो को ज्यादा प्रभावी बना सकती है वो है फोरग्राउंड(सबजेक्ट के आगे का हिस्सा)और बैकग्राउंड(सबजेक्ट के पीछे का हिस्सा)। इस पर भी ध्यान देना जरुरी है। साथ ही ये भी देखना पड़ेगा कि आपका सबजेक्ट क्या है। अगर आप किसी की सुंदर आंखों को दिखाना चाहते हैं और क्लिक करते समय उस व्यक्ति का सिर से पैर तक पूरा फोटो क्लिक करें तो आपका विषय या सबजेक्ट खो जाएगा। इसलिये जो आपको अच्छा लगता है, जिस एंगल से अच्छा लगता है। उस को उसी तरह से क्लिक करें। अर्थात सबजेक्ट आपके फोटो में किस जगह होना चाहिए, उसका एंगल क्या होना चाहिए ये ही कम्पोजिशन कहलाता है।
फोटोग्राफी में अच्छे कम्पोजिशन के लिये कुछ नियम बनाए गए हैं।
1-Rule of Third-— क्लिक करने से पहले अपने दृश्य को दो आड़ी और दो खड़ी लाईनों की सहायता से 9 बराबर हिस्सों में बांटें। आप देखेंगे की ये लाईन जहां एक दूसरे को काटती हैं वो मध्य में नहीं होता बल्कि हर लाईन का थर्ड या तीसरा हिस्सा एक दूसरे को काटता है। एेसे चार मुख्य पाईंट होते हैं। रुल आफ थर्ड के अनुसार ये पाईंट सबसे ज्यादा आई केचिंग होते हैं। इसलिये अगर आपका मुख्य सबजेक्ट फ्रेम में इस स्थान पर होता है तो फोटो ज्यादा आकर्षक होता है। आमतौर पर राईट साईड में नीचे वाला पाईंट सबसे उपयुक्त माना जाता है।

Rule of Third

Rule of Third

2- Balancing element– हमने देखा कि सबजेक्ट अगर फोटो के केंद्र से थोड़ा हटकर हो तो ज्यादा आकर्षक होता है, लेकिन अगर हम बाकी फ्रेम को खाली छोड़े दे तो फोटो का संतुलन बिगड़ जाता है। इसलिये जरुरी है कि दूसरे कम जरुरी विषय से फोटो के खाली स्थान को भरा जाएे। ताकि फोटो में खालीपन न रहे।

Balancing element

Balancing element

3- Lines & Curves– फोटो में लाईन एंड कर्वस का अत्यंत महत्व होता है। उदाहरण के रुप में अगर आप उंचाई से किसी धुमावदार सड़क का फोटो ले रहे हो तो ये धुमाव आपको बहुत सुंदर लगेंगे लेकिन अगर इसमें पेड़ो के सीथे तने अर्थान सीधी लाईनें भी मिल जाएेंगी तो फोटो ज्यादा आकर्षक होगा।
अगर हम सीधी लाईनों की जगह Diagonal(आड़ी) लाईन्स को लेते हैं तो फोटो ज्यादा अच्छा होता है। जैसे एक सीधी सड़क अगर आपके फ्रेम को आड़ा काटे तो फोटो बढ़िया होता है। इसी तरह हम अगर किसी सड़क के कर्वस या धुमावों को फोटो में ले तो अच्छा होता है। इस तरह हमें फोटो में लाईन्स और कर्वस का विशेष ध्यान रखना चाहिएे।

Lines & Curves

Lines & Curves

Lines & Curves

Lines & Curves

Diagonal lines

Diagonal lines

4 symmetry and pattern– जब हम रास्ते से गुजरते हैं या कही धूमने जाते हैं तो कई एेसे पैटर्न हमारे सामने बन जाते हैं। जो बहुत सुंदर दिखाई देतें है। इसके साथ जब हम अपने दृश्य में एक सिमिट्री या एक लय बनाते हैं तो फोटो खूबसूरत हो जाता है। इसलिये फोटो में सिमिट्री और पेटर्न का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

symmetry

symmetry

pattern

pattern

5- व्यू पाईंट- ये सबसे महत्वपूर्ण फेक्टर है। इसका मतलब है कि आपका क्लिक एंगल क्या है। सामान्य तौर पर हम आईलेवल फोटोग्राफी ही करते हैं। लेकिन कभी विषय की खूबसूरती के लिये अपने अपने एंगल को उपर या नीचे भी कर लेते हैं। विषय के अनुसार ये भी जरुरी होता है।

View point

View point

6- डेप्थ– डेप्थ का अर्थ है फोटो की गहराई अर्थात आपके फोटो का कितना ज्यादा हिस्सा फोकस में है। जैसे लेडस्केप या सिटीस्केप लेते समय डेप्थ जितनी ज्यादा होगी फोटो उतना ही आकर्षक होगा। पोर्टेट में अगर हम लो डेप्थ रखेंगे अर्थात चेहरे के अलावा बाकी सब आउट आफ फोकस कर देंगे तो चेहरा ज्यादा उठ कर आएेगा।
डेप्थ आफ फील्ड के विषय में हम आगे और विस्तार से पढ़ेंगे।sheep-hills

CLASS- 5

आज हम कैमरा आपरेटिंग के तरीके सीखेंगे।
सबसे पहले हमें कैमरा होल्ड करने का सही तरीका आना चाहिए।
एसएलआर कैमरे की बनावट एेसी होती है कि आप की पकड़ अच्छी हो। बस सही तरीका आना चाहिए। कैमरा जितना स्थिर होगा, आपका फोटो उतना ही शार्प होगा। इसलिये सही तरीका आना जरुरी है।

Right way to hold the camera

Right way to hold the camera

1- कैमरा हाथ में लेते ही सबसे पहला काम बेल्ट को गले में डालें। या अपने हाथ की कलाई पर लपेट लें। ये सबसे जरुरी काम सबसे पहले करें। ये आपके कैमरे की सुरक्षा के लिये जरुरी है।
2- कैमरा हमेशा सीधे हाथ में पकड़े। इसके लिये अंगूठे के बाद पहली उंगली को क्लिक बटन पर रखें। बाकी तीन उंगलियों को उसके नीचे रखकर अच्छी पकड़ बनाएें। अगूठे को कैमरे के पिछले हिस्से में रखें। ये यहां पर सेटिंग बटन्स को आपरेट करेगा।
3- अब कैमरे को सीधे हाथ से पकड़े हुए, उल्टे हाथ की हथेली पर रखें। हथेली खुली हुई कप जैसा आकार बनाती हुई होनी चाहिए। इस तरह यह हथेली कैमरे के लिये आधार का काम करेगी। उल्टे हाथ का अंगूठा और उंगली कैमरे के जूम रिंग और अगर फोकस रिंग को एडजस्ट करने का काम करेगा।
4- अब कैमरे व्यूफाईंडर को अपनी अांख ले लगाएें और अच्छी तरह चिपका लेे। (जब तक जरुरी न हो एलईडी स्कीन में देखकर फोटो क्लिक न करें)
5- कैमरे को ज्यादा स्थिरता देने के लिये अपनी दोनों कोहनियों को हवा में न लटकाएें बल्कि उन्हें अपने शरीर से अच्छी तरह चिपका लें।
6- क्लिक करते समय अगर पैरों को फैला कर रखेंगे तो ज्यादा स्थिरता मिलेगी।
नोट- किसी भी क्लिक को करने से पहले अपनी कैमरे की सेटिंग चेक कर लें क्योंकि हर एक क्लिक महत्वपूर्ण होता है।
7- स्लो शटर स्पीड पर फोटो लेने में हमेशा शेकिंग की प्राब्लम होती है। इसके लिये कोशिश करें। कि अपने शरीर को आगे की ओर झुकाएें और कोहनियों को किसी सतह पर टिकाएं। एेसा करने से आपको कैमरा स्टेंड जैसी सुविधा होगी।
8- अगर आप ज्यादा स्लो शटर स्पीड यूस कर रहे हैं अर्थात लांग एक्सपोजर दे रहे हैं, तो आपको अपनी सांसों को भी नियंत्रित करना आना चाहिए। केमरा क्लिक करने से पहले अपनी सांस बाहर छोड़े और रुकें। क्लिक के बाद फिर सामान्य सांस लें। अगर आप सांस लेते हुए या अंदर सांस भरकर क्लिक करते हैं तो कैमरा शेकिंग की संभावना बनी रहती है।
9- शरीर को ज्यादा स्थिर रखने के लिये अगर संभव हो तो पीठ को कहीं टिकाकर ज्यादा स्थिरता प्राप्त कर सकते हैं।

Right way to hold the camera

Right way to hold the camera

Class-6

आज हम एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करेंगे। यह है सबजेक्ट को सही फोकस करना।
कई बार आप कुछ अच्छे क्लिक करते हैं। लेकिन बाद में जब रिजल्ट देखते हैं तो फोटो फोकस में ही नहीं होता। इसलिये सबसे जरुरी है सही फोकस करना।
डीएसएलआर कैमरे में मुख्य रुप से दो तरह के फोकस मोड होते हैं।
आटो फोकस और मेनुअल फोकस
आटो फोकस अर्थात कैमरा खुद फोकस करता है। जब आप क्लिक बटन दबाते हैं तो कैमरा फोकस कर लेता है। इसका भी एक सही तरीका होता है। क्लिक बटन को तेजी से पूरी तरह दबाना गलत तरीका है। सही फोकस करने के लिये इसे पहले आधा दबाना चाहिए इसके बाद आपको बीप की आवाज आएगी अर्थात फोकस हो गया है। इसे दबाए रखने से focus lock हो जाता है। अब इसे बगैर छोड़े आगे क्लिक बटन को पूरा दबाकर क्लिक करने से focused image मिलती है।

right way to click button

right way to click button

कैमरे में फोकस के लिये फोकस पाईंट होते हैं। जिनकी संख्या हर कैमरे में अलग-अलग होती है। जैसे 9,11, 39, 51 इत्यादि। ये फोकस पाईंट व्यू फाईंडर से झांकने पर आपको दिखाई देते हैं। फोकस पाईंट जितने ज्यादा होते हैं उतना अच्छा होता है।

Focus point

Focus point

फोकस के लिये निम्न सेटिंग्स होती हैं।
सिंगल एरिया फोकस मोड(“AF-S” in the Nikon world or “One shot AF” in the Canon)– इस मोड में आप एक फोकस पाईंट तय कर लेते हैं।(सामान्यतः मध्य का फोकस पाईंट) जब आप अपने शटर बटन को हाफ प्रेस करते हैं अर्थात आधा दबाते हैं तो आपका सबजेक्ट फोकस हो जाता है और यह इसी स्थान पर फिक्स हो जाता है। इसके लिये जरुरी है कि आपका फोकस पाईंट ठीक सबजेक्ट पर हो। अब आप बटन को पूरा दबाकर क्लिक कर सकते हैं। यह मोड स्थिर सबजेक्ट के लिये अच्छा है। इस सेटिंग में अगर कैमरा फोकस नहीं करता तो क्लिक भी नहीं हो पाता।

Single-Point-AF-

Single-Point-AF-

कन्टिन्यूयस मोड(“Continuous/AF-C” (Nikon) or “AI Servo” (Canon))- जब आपका सबजेक्ट लगातार मूव कर रहा हो जैसे स्पोर्टस या वाइल्डलाइप में तो आप एक स्थान पर फोकस करते है तब तक सबजेक्ट अपनी जगह बदल लेता है। इसलिये कन्ट्यूनियस मोड यूस करना चाहिए। इस मोड में कैमरा लगातार फोकस करता रहता है। आप अपने कैमरे को सबजेक्ट के साथ साथ मूव कर सकते हैं परफेक्ट एक्शन मिलने पर क्लिक कर सकते हैं।

continuous mode

continuous mode

हायब्रिड मोड(“AF-A” (Nikon) or “AI Focus AF” (Canon))– यह सिंगल और continuous के बीच का रास्ता है। इसमें कैमरा खुद फोकस पाईंट तय करता है। अगर सबजेक्ट स्थिर हो तो यह सिंगल फोकस की तरह काम करता है। मूविंग सबजेक्ट में ये फोकस पाईंट बदलकर सबजेक्ट को फोकस करता है।
एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि अगर सबजेक्ट डार्क हो या प्लेन हो तो कैमरे को फोकस करने में परेशानी होती है। इसके लिये हमें सबजेक्ट में एेसे पाईट ढूंढना चाहिए जो चमक रहे हों या विषय में उभर कर दिख रहे हों।

AF-A

AF-A

मेनुअल फोकस मोड-(M) कुछ परिस्थितियों में कैमरा आटो फोकस नहीं कर पाता इसलिये मेनुअल फोकस करना चाहिए। कैमरे के लेंस में एक फोकस रिंग होती है जिसकी सहायता से सबजेक्ट को मेनुअली फोकस किया जा सकता है।

canon AF system

canon AF system

nikon AF system

nikon AF system

CLASS 7- 

आज हम कैमरा के विभिन्न आपरेटिंग मोड्स को समझेंगे

कैमरे में लेफ्ट साईड उपर एक गोल डायल होता है। जिसमें P A S M इत्यादि लेटर बने रहते हैं। इन्हे समझना जरुरी है क्योंकि ये कैमरे के विभिन्न मोड हैं। जो अलग अलग परिस्थिति में आपकी सहायता करते हैं।

अॊटो कैमरा मोड-  इस सेटिंग पर कैमरा पूरी तरह से आटो रहता है। आपको सिर्फ क्लिक करना होता है।

प्रोग्राम आटो मोड (p)- कैमरा की पूरी तरह आटो होने से कई बार कुछ परेशानी हो जाती है। इसके लिये ही प्रोग्राम मोड बनाया गया है। इस मोड पर भी कैमरा अपरचर और स्पीड खुद तय कर लेता है। लेकिन आप अपरचर और स्पीड की इस सेटिंग को बदल भी सकते है। इसके लिये सीधे हाथ पर पीछे स्थित स्क्रोल डायल को धुमाने से यह सेटिंग बदल जाती है। इसे प्रोग्राम शिफ्ट कहते है। इसके अलावा इस मोड पर यह भी हम तय कर सकते हैं कि बिल्ट इन फ्लैश को फायर करना है या नहीं। इस मोड पर वाई़ड बैलेंस  और एक्सपोजर कंपनसेशन को भी हम खुद एडजस्ट कर सकते है। (इन शब्दों को हम आगे समझेंगे)

अपरचर प्रायरिटी मोड(A in nikon & Av in canon)- इस मोड पर हम कैमरे में अपने मनचाहा अपरचर सेट कर सकते हैंं। कैमरा इसके अनुसार शटर स्पीड स्वयं तय कर लेता है। आम तौर पर जब लेंडस्केप क्लिक करने के लिये छोटे अपरचर जैसे f11,f16– की जरुरत पड़ती है तब इसे यूस करते हैं।

शटर प्रायरिटी मोड(S in nikon & Tv in canon)- कभी कभी हम चाहते हैं कि हमारी शटर स्पीड न बदले और फोटो भी बढ़िया आए इसके लिये हम इस मोड का उपयोग करते हैं। इस मोड पर हम शटर स्पीड फिक्स कर देते हैं। कैमरा इसके अनुसार अपरचर तय कर लेता हैं। फास्ट मूवमेंट जैसे स्पोर्टस इत्यादि को केप्चर करने के लिये हमें फास्ट शटर स्पीड  जैसे 1/500, 1/1000 s चाहिए। यह मोड इस समय काफी सहायक होती है।

मेनुअल मोड(M)– इस मोड पर आप पूरी तरह से कैमरे के मालिक हो जाते हैं। अपरचर, स्पीड इत्यादि सभी आप तय करते हैं। लेकिन इस मोड को तब ही उपयोग में लाएें जब आप अच्छी तरह सीख लें।

इसके अलावा कैमरे में पोर्टेट मोड, स्पोर्टस मोड, नाईट मोड, क्लोसअप मोड इत्यादि भी होते हैं।

Mode Dial in Nikon & Canon

Mode Dial in Nikon & Canon

CLASS- 8

आज हम डीएसएलआर के इमेज सेंसर के बारे में पढ़ेंगे।
हमारी फोटो की क्वालिटी क्या होगी, यह बहुत कुछ कैमरे पर भी निर्भर करता है और मुख्य रुप से कैमरे के इमेज सेंसर पर। डिजिटल टेक्नालाजी आने से पहले हम कैमरे में फिल्म यूस करते थे। अब इमेज सेंसर ने फिल्म को रिप्लेस कर दिया है, लेकिन इसका आधार वही है। फिल्म फोटोसेंसिटिव अर्थात प्रकाश संवेदी मटेरियल की बनी होती है उसी प्रकार सेंसर भी फोटोसेंसिटिव होता है। सेंसर का काम होता है उस पर पड़ने वाले लाईट को इलेक्ट्रानिक सिगनल्स में बदल कर आगे पहुंचाना। जहां इमेज स्टोर होती है।
इमेज सेंसर दो प्रकार के होते हैं। CCD सेंसर और CMOS सेंसर
CCD अर्थात चार्ज कपल्ड डिवाईस पहले बहुत कैमरे में होते थे, परंतु ये बहुते मंहगे होते थे और पावर भी ज्यादा यूस करते थे। इसीलिये अब ज्यादातर CMOS यूस होते हैं। ये साईज में बड़े होते हैं. इसीलिये ज्यादा लाईट केप्चर करते हैं। साथ ही सीसीडी की तुलना में सस्ते भी होते हैं।
इमेज सेंसर के साईज के आधार पर कैमरे के अलग अलग प्रकार होते हैं। कैमरे का सेंसर साईज जितना बड़ा होता है। इमेज क्वालिटी उतनी ज्यादा होती है। क्योंकि सेंसर छोटे छोटे फोटसाईटस से बना होता है। ये ही प्रकाश को ग्रहण करते है। बड़ा सेंसर मतलब बड़े फोटोसाईटस और ज्यादा पिक्चर शार्पनेस।
इसके आधार पर निम्न प्रकार के कैमरे होते हैं।

 

Full Frame & Cropped Frame sensor

Full Frame & Cropped Frame sensor

फुल फ्रेम सेंसर- इस सेंसर का साईज ठीक उतना ही होता है। जितना हमारी कैमरा35सस फिल्म के निगेटिव का होता था। इसलिये इसे फुल फ्रेम कहते हैं। इसका साईज होता है 36mmx24mm
क्राप्ड फ्रेम सेंसर– ये सेंसर फुल फ्रेंम से छोटे होते हैं। साईज के आधार पर ये APS-H, APS-C इत्यादि होते हैं। जिसे नीचे चार्ट से समझा जा सकता है।

sensor chart

sensor chart

 

sensor chart

sensor chart

Class -9

आज हम पढ़ेंगे बेस्ट एक्सपोजर रीडिंग या सही लाइट तय करना।
नए फोटोग्राफरर्स को हमेशा एक परेशानी होती है। फोटो काला हो गया या सफेद हो गया। तकनीकी रुप से कहें तो कभी अंडरएक्सपोज हो गया कभी ओवरएक्सपोज हो गया।
फोटोग्राफी में Auto modes आने से पहले कैमरे पूरी तरह manual होते थे अर्थात फोटोग्राफर स्वयं ही तय करता था कि किस लाईट में क्या अपरचर और स्पीड सेट करके फोटो लेना है।
अब डीएसएलआर में मेनुअल मोड के अलावा कई सारे आटो मोड होते हैं जैसे Fully auto, program, aperture priority, shutter priority.
हमें लगता है कि कैमरे को किसी भी आटो मोड पर लगाने से फोटो परफेक्ट आएगा, लेकिन एेसा नहीं होता। इसका कारण क्या है।
इसका कारण है जब हम किसी फोटो को क्लिक करते हैं तो उसमें अलग अलग तरह के लाईट एरिया होते हैं। कहीं पर डार्क कहीं लाईट होता है। कैमरा के सामने जब यह स्थिति बनती है तो वह midtones अर्थात मध्य का एक्सपोजर देता है। इस स्थित में आपका मुख्य सबजेक्ट कभी अंडर हो जाता है कभी ओवर।
डीएसएलआर में built-in exposure meter होता है। जो एक्सपोजर रीड करता है।
इसके भी कुछ अलग अलग मोड होते है। मुख्य रुप से तीन मोड होते हैं।

metering modes

metering modes

Matrix Metering (Nikon), also known as Evaluative Metering (Canon)-
ये सबसे पापुलर मोड है। इस मोड में कैमरा पूरे सीन की लाईट रीड करता है। सभी ब्राईट और डार्क एरिया को बेलेंस करने के लिये मिडटोन देता है। जब आप लेडस्केप क्लिक कर रहे हों जहां आसमान और जमीन दोनो हैं तो ये मोड अच्छा होता है। इसके अलावा अगर आपका मुख्य सबजेक्ट, आपके फ्रेम में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा कवर कर रहा हो तो भी ये मोड अच्छा है। इस मोड में आपका फोकस पाईंट भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि कैमरा इसी पाईंट को प्रमुख मानकर रीडिंग करता है।

Matrix-Metering

Matrix-Metering

Center-weighted Metering- इस मोड में कैमरा फ्रेम के सेंटर और उसके आसपास का लाइट रीड करता है और कार्नर्स को ignore करता है। इसलिये जब हमारा मुख्य सबजेक्ट लगभग सेंटर में हो तथा पीछे से लाइट आ रहा हो तो इस मोड को यूस करना चाहिए। इस मोड में कैमरा फोकस पाईंट के आधार पर एक्सपोजर नहीं देता है।

Center-weighted-Metering

Center-weighted-Metering

Spot Metering– यह मोड पूरी तरह फोकस पाईंट पर डिपेंड करता है। इसमें कैमरा आपके फोकस पाईंट के आसपास छोटे से हिस्से का एक्सपोजर ही तय करता है। आप इसे एेसे समझ सकते हैं कि जब आपके फ्रेम में सब्जेक्ट बहुत छोटा सा हो तो इस मोड को यूस करने से एक्सपोजर सही मिलता है। उदाहरण के तौर पर जब आप रात में चांद का फोटो लेते हैं तो उसकी डीटेल्स बहुत कम आती है क्योंकि वो आपके फ्रेम में बहुत छोटा सा हिस्सा होता है। इसलिये जब आप इस मोड को यूस करते हैं तो फोटो अच्छा आता है।

Spot-Metering

Spot-Metering

मेनुअल एक्सपोजर- इन सबके अलावा जब आप खुद एक्सपोजर तय करना चाहें तो मेनुअल मोड पर जाना चाहिए। यहां आप अपरचर और स्पीड(जिसके बारे में हम पुराने चेप्टर में बात कर चुके हैं) को सेट करके अपना मनचाहा एक्सपोजर ले सकते हैं।
एक चीज और ये है कि जब हम शटर बटन को हाफ प्रेस करते हैं तो फोकस के साथ-साथ एक्सपोजर भी लाक हो जाता है। इसके अलावा कैमरे में एक एईलाक बटन होता है। आटो मोड पर हम इस बटन को दबाकर एक्सपोजर लाक कर सकते है।

Class 10

कैमरा खरीदने से पहले इन बातों का खास ख्याल रखें और फिर अपना कैमरा तय करें।
सेेसर क्वालिटी- कैमरे में सबसे महत्वपूर्ण बात सेंसर क्लालिटी और साईज होता है। आज कर अच्छे एंट्री लेवल कैमरों में 24 x 16 mm APS C टाईप सेंसर आ रहे हैं कैमरा लेते समय इसका खास ध्यान रखें

Image sensor

Image sensor

लेस रेंज- कैमरे खरीदते समय ये भी ध्यान रखें कि आप को इसकी लेंस रेंज भी चाहिए। इसलिये आप अपनी पाकेट के हिसाब से वो कैमरा तय करें जिसके लेंस भी आप आसानी से ले सकें।
बर्स्ट मोड- ये अपने कैमरे में जरुर देखें। इसे कन्ट्यूनियस मोड भी कहते है। ये आपके कैमरे की क्लिकिंग स्पीड है। जेैस 6 फ्रेम पर सेंकंड इत्यादि।

Burst mode

Burst mode

फोकस पाईंट- कैमरे में जितने ज्यादा फोकस पाईंट होंगे आपका फोकस उतना फास्ट और शार्प होगा इसलिये इसका खास ध्यान रखें।

Focus point

Focus point

आटो फोकसिंग आप्शन- इसपर भी ध्यान दें कि आपको फोकसिंग के कितने आप्शन मिलते हैं। जैसे सिंगल , एरिया, कन्ट्यूनियस(इसे विस्तार में पुराने चेप्टर में पढ़ें)
लाइव व्यू- कैमरा स्क्रीन पर लाईव व्यू भी महत्वपूर्ण है। आजकल मूवेबल स्क्रीन उपलब्ध हैं। ये आपको मूवी मोड पर सहायता करेगी।
मीटरिंग मोड- इसके बारे में उपर चेप्टर में विस्तार से बताया गया है। कैमरा तय करते समय इसका भी ध्यान रखें।
मेगापिक्सल- मेगापिक्सल हमारी पिक्चर क्वालिटी तय करता है इसलिये इसका भी ध्यान रखना चाहिए। लेकिन अगर सेंसर साईज छोटा है तो हाई मैगापिक्सल का कोई मतलब नहीं। इसलिये कोशिश करें लगभग 16 मैगापिक्सल का कैमरा अच्छा होता है। इतना तो कम से कम हो ही।
Optical stabilization- कैमरा लेंसेस में VR (Nikon) या IS(canon) का ध्यान रखें। ये स्लो शटर स्पीड और टेली रेंज पर आपका फोटो में हेंडशेकिंग के असर को कम करेगा।
कैमरा बाडी- आजकल कैमरे में प्लास्टिक और मेटल अलाय दोनों यूस होते है। मैटल अलाय कैमरे को मजबूती देता है। इसका ध्यान रखें।
इन बिल्ट फोकस मोटर- कुछ कैमरों में इसबिल्ट फोकस मोटर नहीं होती जिससे आपको फोकस मोटर वाले महंगे लेंस लेना पड़ते हैं। इसका ध्यान दें कि कैमरे में इनबिल्ट फोकस मोटर हो।
इमेड प्रोसेसर- कैमरे में अच्छे और फास्ट इमेज प्रोसेसर का होना जरुरी है क्योंकि इससे आपके कैमरे की क्लिकिंग स्पीड अच्छी मिलती है।

Class 11- Flash Photography

आज हम फ्लैश फोटोग्राफी की बात करेंगे।
कई बार हम सुनते हैं कि फ्लैश फोटोग्राफी में मजा नहीं है, Available Light में ही अच्छी फोटोग्राफी होती है। लेकिन एेसा नहीं है। कैमरे में उपलब्ध हर चीज का अपना महत्व है। परिस्थितियों के अनुसार आपको तय करना है कि आपके अच्छे फोटो की जरुरत क्या है।
आम तौर पर सभी कैमरों में built in flash होती है।

Built in flash

Built in flash

कम प्रकाश में इसका उपयोग कर हम बढ़िया रिजल्ट प्राप्त करते हैं।
कैमरे में कई बार हम देखते हैं कि हमारा फ्लैश अपने आप पाप अप हो जाता है या खुल जाता है।
इसके लिये अपने कैमरे का मोड चैक करें।
फुली आटो मो़ड पर कैमरा फ्लैश भी आटो कंट्रोल होता है। जब कैमरा सेंसर लो लाइट बताता है तो फ्लैश अपने आप आन हो जाता है। लेकिन बाकी सभी मोडस पर कैमरा फ्लैश को हम अपनी जरुरत के अनुसार यूस कर सकते हैं। इसके लिये कैमरा में फ्लैश पाप अप बटन होता है।
DSLR में बिल्ट इन फ्लैश दो तरह से काम करता है।
Manual and TTL
मेनुअल मोड में कैमरा फ्लैश खुद सही एक्सपोजर नहीं देता इसलिये हमें अपने अपरचर को तय कर सही एक्सपोजर लेना होता है।
टीटीएल मोड- ये सबसे पापुलर और बेहतर मोड है।
इस मोड का मतलब होता है Through the lens मोड।
जब हम फ्लैश फायर करते हैं तो जो लाईट हमारे सबजेक्ट से टकराकर वापस हमारे लेंस के अंदर आता है। उसे सेंसर रीड करता है। इससे हमेशा सही एक्सपोजर मिलता है। हर एक्सपोजर मोड पर ये फ्लैश सेटिंग कारगर होती है।
कैमरा के बिल्ट इन फ्लैश में भी कुछ अलग अलग मोड होते हैं।

flash modes

flash modes

Normal Mode– इस मोड पर फ्लैश नार्मली काम करती है। इसे आउटडोर में फिल इन फ्लैश की तरह यूस करते हैं। इनडोर में यह मेन लाइट सोर्स की तरह काम करती है। आउटडोर में जब हमारे सबजेक्ट पर शेडोस होती हैं तो फिल इन फ्लैश इन्हें बैलेंस करती है।
Slow Sync Mode– इस मोड पर कैमरा उपलब्ध प्रकाश की नार्मल सेटिंग पर होता है। फ्लैश सिर्फ अपनी पहुंच तक के सबजेक्ट को प्रकाशित करती है।
उदाहरण के तौर पर जब नार्मल फ्लैश से कमरे में फोटो लेते हैं तो हमारा सबजेक्ट ठीक होता है लेकिन उसकी पहुंच से दूर बैकग्राउंड डार्क हो जाता है लेकिन स्लो सिंक में कैमरा अपनी शटर स्पीड कमरे में उपलब्ध प्रकाश के अनुसार लेता है इसलिये बैकग्राउंड भी सही आता है। इनडोर में स्लो सिंक में यह ध्यान रखें कि इस समय कैमरा बहुते स्लो शटर स्पीड लेता है। इसलिये फ्लैश के बाद भी फोटो शेकिंग की संभावना रहती है।
Rear Curtain Mode– सामान्य रुप से जब हम स्लो शटर स्पीड पर हम फ्लैश फायर करते हैं तो पहले क्षण में ही फ्लैश फायर होती है। लेकिन रियर कर्टेन मोड पर यह फ्लैश शटर बंद होने के ठीक पहले चमकती है।

Front curtain(normal) & rear curtain flash result

Front curtain(normal) & rear curtain flash result

External Flash– कैमरे की बिल्ट इन फ्लैश के ठीक उपर एक माउंट होता है जहां हम बाहरी या एक्सटर्नल फ्लैश फिट कर सकते है।
आजकल डिजीटल फ्लैश आती हैं। इनमें भी टीटीएल और मेनुअल मोड होता है।

External flash

External flash

Class 12- Night Photography

ऩाईट फोटोग्राफी– अक्सर हम कहीं रात को चमचमाते शहर के फोटो देखते हैं। ये बहुत आकर्षक होते हैं। इसे क्लिक करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं। इसलिये आज हम नाईट फोटोग्राफी पर बात करेंगे।
कैमरा ट्राईपोड(स्टेंड)– जब हम रात में फोटो क्लिक करते हैं तो सामान्यतः प्रकाश बहुत कम होता है। इसलिये हमे बहुत स्लो शटर स्पीड मिलती है। इसलिये जरुरी है कि हम कैमरा स्टेंड का यूस करें। अगर कैमरा स्टेंड न हो तो हमें किसी दीवार या अन्य जगह को स्टेंड की तरह यूस करना चाहिए। मुख्य बात यह है कि किसी भी हालत में कैमरा हल्का सा भी नहीं हिलना चाहिए।

tripod

tripod

एक्सपोजर मो़ड- वैसे तो हम किसी भी आटो मोड पर क्लिक कर सकते हैं लेकिन अगर हम मेनुअल मोड पर अपना अपरचर और स्पीड खुद सेट करते हैं तो यह ज्यादा अच्छे रिजल्ट देता है।
आईएसओ- ये डिपेंड करता है कि आपको क्या क्लिक करना है। अगर आप अपने फोटो में मूविंग आबजेक्ट को भी लेना चाहते हैं तो हाई आईएसओ का यूस करें।
नाईट स्केप- नाईट स्केप क्लिक करने के लिये सबसे पहले उचित जगह चुने जो उंचाई पर हो। कोशिश करें की स्टेंड साथ में हो। अब मेनुअली अपरचर सेट करे। एफ 8 या 11 चुनें क्योंकि इस सेटिंग पर हमें अपने फोटो में फोकस्ड एरिया ज्यादा मिलेगा।

Night scape

Night scape

लाईट ट्रेल- लाईट ट्रेल अर्थात प्रकाश की लबीं लंबी लकीरें बनाने के लिये लांग एक्सपोजर अर्थात वेरी स्लो शटर स्पीड जैसे 5 या 7 सेकंड यूस करें। इसे जितना बड़ा सकें उतना अच्छा है। कैमरे में सामान्यतः 30 सेकेंड तक का शटर स्पीड मिलता है

board-office-square, light trail

board-office-square, light trail

Class-13

बर्ड फोटोग्राफी-
आज हम बर्डस के सुंदर फोटो क्लिक करने के सही तरीकों को पढ़ेगे।
सबसे पहले वह स्थान देखें जहां पानी हो क्योंकि पानी के स्रोत के करीब ही पक्षी ज्यादा दिखाई देते हैं और नेस्टिंग सीजन में वे आसपास ही घोंसले भी बनाते हैं।
खुद को ज्यादा से ज्यादा छुपाने की कोशिश करें। इसके लिये अपने कपड़े प्रकृति से मिलते जुलते रंगों जैसे घूसर हरा, ग्रे का प्रयोग करें। लाल नीले पीले इत्यादि भड़कीले रंगों से बचें।
अगर संभव हो तो अपनी पोजीशन एेसी रखें कि आपकी और बर्ड की उंचाई में ज्यादा अंतर न हो।
अपने मूवमेंट बहुत धीमें रखें और धेर्यपूर्वक अच्छे एंगल का इंतजार करें।
अपने अपने कैमरे में इस सेटिंग्स को लगाएें।
1- आटोफोकस को कनय्टूनियस मोड पर लगाएें।
2 – शटर स्पीड जितनी हाई (मिनिमम 1000) रख सकें उतना अच्छा है।
3- अपरचर को 4 से 8 के बीच में रखें ताकि आपकी डेप्थ आफ फील्ड बहुत कम न हो।
4- बर्ड की आंख को फोकस करें और उड़ते समय बर्ड के साथ कैमरा को पेन करें।
5- दोनो आखों को खुला रखकर क्लिक करने की कोशिश करें ताकि आप बर्ड के मूवमेंट को सही तरीके से फालो कर सकें।
6- बेकग्राउंड का खास ख्याल रखें। अगर पेड़ो का बेकग्राउंड मिलेगा तो फोटो ज्यादा अच्छा लगेगा।
7- कैमरा बर्स्ट मोड पर रखें ताकि एक साथ कई क्लिक हो और आपका अच्छा एक्शन मिस न हो।

Baya bird making nest

Baya bird making nest

Brahmani-Duck-or-Ruddy-Shell-Duck-or-Surkhab in flight

Brahmani-Duck-or-Ruddy-Shell-Duck-or-Surkhab in flight

See u in next class bye

 

मित्रों मुझे आपसे एक शिकायत है कि आप मेरे इस प्रयास के बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। ये आपको कैसा लग रहा है। कोई परेशानी या कोई शिकायत या सुझाव अगर देते रहेंगे तो मुझे आगे लिखने में मजा आएेगा। इसलिये कृपया इस पेज के कमेंट बाक्स में या फेसबुक पर इसके बारे में जरुर बताएें। अगर आपको ये प्रयास अच्छा लग रहा हो तो इसे अपने अन्य दोस्तों के साथ शेयर करें। आप फेसबुक या ट्वीटर पर भी इस पेज शेयर कर सकते हैं।

संपूर्ण वेबसाईट देखने के लिये क्लिक करें- 

http://tulsiphotonews.com/

12 thoughts on “LEARN PHOTOGRAPHY

  1. Dr. Tanima Dutta says:

    Thanks a ton Devendra bhai. For someone who loves images and is an amateur Photographer, your this initiative is very much appreciated.

  2. Thank you Devendra bhai your text ..it was a happy surprise for me but… it was required ,I mean ,I was looking for a professional Guru for me, as I myself own a CANNON 650 D, DSLR Camera and a Camera stand + extra lenses too, but how to take full advantage from this unit,I dont know, hopefully ,I shall be benefited wd your guideline,to use it with more expertise and accuracy….

  3. Very nice information about camera

  4. the article will inspire thousands of young photographers……A good effort to depict relative terms of camera,keep up.

  5. तनवीर says:

    बहुत बढ़िया जानकारी आसान भाषा मे

  6. shandaar dd bhai.aap b kamal ke ho.

  7. उबैद कुरैशी भोपाल says:

    बहुत शानदार आपने पुरी जानकारी बताई बहुत बडीया है देवेन्द्र भाई

  8. Dr. Jiblal Sapkota says:

    बहुत शानदार आपने पुरी जानकारी बताई

  9. Sachchidanand Singh says:

    Thanks dear for this wonderful information of great use for camera users …I have never seen such type of detailed stepwise information with example pics…regards…SN Singh

  10. Manoj Joshi says:

    बहुत शानदार ! लेकिन matter बहुत लंबाहै। इसे अलग अलग पार्ट में करते तो और बेहतर होता ।

  11. राकेश मालवीय says:

    बहुत बढिया

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